नववर्ष पूरा विश्व आमतौर पर एक जनवरी को नववर्ष बड़ी धूमधाम के साथ मनाता है लेकिन हिंदूधर्म का नववर्ष चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के दिन प्रारम्भ हो...
नववर्ष
सूर्य और चंद्रमा के अनुसार गणना
दरअसल भारतीय कैलेंडर की गणना सूर्य और चंद्रमा के अनुसार होती है. माना जाता है विक्रमादित्य के काल में सबसे पहले भारत से कैलेंडर अथवा पंचाग का चलन शुरू हुआ. इसके अलावा 12 महीनों का एक वर्ष और सप्ताह में 7 दिनों का प्रचलन भी विक्रम संवत से ही माना जाता है.
भारत में प्रचलित हैं अनेक काल गणनाएं
भारत में सांस्कृतिक विविधता के कारण अनेक काल गणनाएं प्रचलित हैं जैसे- विक्रम संवत, शक संवत, हिजरी सन, ईसवीं सन, वीरनिर्वाण संवत, बंग संवत आदि. इस वर्ष 1 जनवरी को राष्ट्रीय शक संवत 1939, विक्रम संवत 2074, वीरनिर्वाण संवत 2544, बंग संवत 1424, हिजरी सन 1439 थी किन्तु 18 मार्च 2018 को चैत्र मास प्रारंभ होते ही शक संवत 1940 और विक्रम संवत 2075 हो रहे हैं. इस प्रकार हिन्दु समाज के लिए नववर्ष प्रारंभ हो रहा है।
प्रतापी और न्यायप्रिय राजा थे विक्रमादित्य
भारतीय कालगणना में सर्वाधिक महत्व विक्रम संवत पंचांग को दिया जाता है. सनातन धर्मावलम्बियों के समस्त कार्यक्रम जैसे विवाह, नामकरण, गृहप्रवेश इत्यादि शुभकार्य विक्रम संवत के अनुसार ही होते हैं. विक्रम संवत् का आरंभ 57 ई.पू. में उज्जैन के राजा विक्रमादित्य के नाम पर हुआ. भारतीय इतिहास में विक्रमादित्य को न्यायप्रिय और लोकप्रिय राजा के रुप में जाना जाता है. विक्रमादित्य के शासन से पहले उज्जैन पर शकों का शासन हुआ करता था. वे लोग अत्यंत क्रूर थे और प्रजा को सदा कष्ट दिया करते थे. विक्रमादित्य ने उज्जैन को शकों के कठोर शासन से मुक्ति दिलाई और अपनी जनता का भय मुक्त कर दिया. स्पष्ट है कि विक्रमादित्य के विजयी होने की स्मृति में आज से 2075 वर्ष पूर्व विक्रम संवत पंचांग का निर्माण किया गया.
*स्वतंत्रता प्राप्ती के पश्चात* *नवम्बर 1952 में वैज्ञानिको और* *औद्योगिक परिषद के द्वारा पंचांग सुधार समिति की स्थापना की गयी । समिति के 1955 में सौंपी अपनी रिपोर्ट में विक्रम संवत को भी स्वीकार करने की सिफारिश की । किन्तु, तत्कालिन प्रधानमंत्री पं. नेहरू के आग्रह पर ग्रेगेरियन केलेण्ड़र को ही राष्ट्रीय केलेण्ड़र के रूप में स्वीकार लिया गया ।ग्रेगेरियन केलेण्ड़र की काल गणना मात्र दो हजार वर्षो की अतो अल्प समय को दर्शाती है । जबकि यूनान की काल गणना 1582 वर्ष, रोम* *की 2757 वर्ष, यहूदी 5768, मिस्त्र की 28691, पारसी198875 तथा चीन की 96002305 वर्ष पुरानी है । इन सबसे अलग यदि भारतीय काल गणना की बात करें तो हमारे ज्योतिष के अनुसार पृथ्वी की आयु एक अरब 97 करोड़ 39 लाख 49 हजार 110 वर्ष है । जिसके व्यापक प्रमाण हमारे पास उपलब्ध हैं । हमारे प्राचीन ग्रंथो में एक एक पल की गणना की गई है ।जिस प्रकार ईस्वी संवत् का सम्बन्ध ईसा से है उसी प्रकार हिजरी सम्वत् का सम्बन्ध मुस्लिम जगत और हजरत मोहम्मद से है । किन्तु विक्रम संवत् का सम्बन्ध किसी भी धर्म से न होकर सारे विश्व की प्रकृति, खगोल सिद्धांत व ब्रम्हाण्ड़ के ग्रहो व नक्षत्रो से है । इसलिए भारतीय काल गणना पंथ निरपेक्ष होने के साथ सृष्टि की रचना व राष्ट्र की गौरवशाली परम्पराओं को दर्शाती है*
वैदिक तर्क
हमारे वैदिक ग्रंथों में स्पष्टतया यह उल्लेखित है कि भगवान ब्रम्हा ने चैत्र शुक्ल प्रतिपदा तिथि से ही सृष्टि की रचना के प्रवर्तन का कार्य प्रारंभ किया था जिसे सात दिनों पूर्ण कर लिया था, अर्थात हमारा यह नववर्ष सृष्टि के निर्माण का आधारभूत स्तंभ है जिसकी छाया में सौहार्द प्रेम एवं आत्मिक परिशुद्धता का वातावरण पुष्ट होता आया है।
चैत्र का महीना हिन्दू कैलेंडर के हिसाब से साल का* *पहला महीना होता है। शास्त्रों के अनुसार चैत्र नवरात्रि के पहले दिन* *आदिशक्ति प्रगट हुई थीं और उनके कहने पर ही ब्रह्राजी ने सृष्टि के निर्माण का काम करना शुरू किया था।* *यही वजह है कि चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से हिन्दू नववर्ष की शुरुआत होती है
भारतीय संवत्सर विश्व की कालक्रम गणना से सत्तावन वर्ष (57) आगे चलता है जो कि इस बात का प्रमाण है कि हम विश्व का दीर्घकाल से नेतृत्व करते हुए समस्त क्षेत्रों में कीर्ति की पताका फहराते आए हैं, इसलिए यह और भी आवश्यक हो जाता है कि हम अपनी संस्कृति के मूल स्वरूप के महात्म्य को ग्रहण कर अपनी पुरातन परिपाटी को पुनर्स्थापित करने के लिए मजबूती के साथ प्रतिबद्धता व्यक्त करें!!
चैत्रनवरात्रि के प्रारंभ के साथ शक्ति की उपासना का प्रारंम्भ इसी प्रतिपदा तिथि के साथ होता है इसके और पहले के समय अर्थात त्रेतायुग में हमारी संस्कृति के आधार मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम प्रभु का अवतरण चैत्र शुक्ल की नवमीं तिथि को हुआ था।
प्राकृतिक
हमारे यहां कि जलवायु ऋतुप्रधान है जो समयांतरालों पर अपनी छटा बिखेरती रहती है, इसी क्रम में हमारे यहां वसंत को ऋतुओं का राजा कहा जाता है। इस बात पर ध्यानाकृष्ट करने एवं प्रमुखता के साथ समझने की आवश्यकता है कि हमारे नववर्ष के प्रारंभ के लिए प्रकृति सहगामिनी के रूप में दृष्टव्य होती है।
बसंत पंचमी को ज्ञान की देवी मां आद्या भगवती सरस्वती का अवतरण दिवस मनाया जाता है, इसी के साथ ही नववर्ष के आगमन की सूचना सम्पूर्ण चराचर जगत में पहुंचने लगती है, प्रकृति अपना श्रृंगार करने लग जाती है सहज ही चहुंओर नूतनता परिलक्षित होने लगती है, फाल्गुन मास में ही वसंत का आगमन होता है किन्तु वसंत अपनी सभी कलाओं से परिपूर्ण होता हुआ चैत्र शुक्ल प्रतिपदा तिथि से ही मूलस्वरूप को प्राप्त करता है इस समय प्रकृति में विद्यमान पेड़-पौधों में पूर्णतया नई पत्तियां एवं कोपलें आने के साथ-साथ सभी ओर शुध्दता का माहौल निर्मित होने लगता हैं, जिसके आनंददायी वातावरण में मन आह्लादित होकर झूमने लगता है। भौरों की कलियों में गुंजार नवीनता का एवं रसपूर्ण वातावरण के बोध को प्रकट करती है।
हमारे यहां की फसलें पक जाती हैं जिसकी कटाई-गहाई का कार्य द्रुत गति से चलने लगता है वर्तमान में आधुनिक तकनीकों के आ जाने के उपरांत हंसिए की खेतों में खनक भले ही कम सुनाई देती हो किन्तु अभी भी ग्रामीण परिवेश में यह संस्कृति बनी हुई है।
नए अनाज के घर आगमन पर किसानों के चेहरे प्रसन्नता से भर जाते हैं।
इसी के साथ ही वर्तमान में लुप्त प्राय होने की कगार में लोककलाएं पुरानी पीढ़ी के द्वारा हमें देखने और सुनने को मिलती हैं इनमें से फसलों की कटाई के समय ही हमारे यहां विन्ध्य अर्थात बघेलखण्ड या कि लगभग सारे देश में अहीर यानि यादवों के द्वारा राई गायन भी इसी समय खेतों में सुनने को मिलता है यह सब हमारे नववर्ष के आगमन से प्रकृति एवं मानव सम्बन्धों की अभिव्यक्ति ही तो है।
चैत्रमास के आगमन एवं नववर्ष से सम्पूर्ण वातावरण आनंदित होकर मंगल गायन करने लगता है, सभी ओर आनंद की अमृत वर्षा होने लगती है पशु-पक्षी, जीव-जंतु सभी में नवजीवन के संचारित होने से प्रेम एवं आनंद से परिपूर्ण नावांकुर प्रस्फुटित होते है जिसकी पावनता में सुख-शांति एवं समन्वय की रसधारा बहने लगती है।
चैत्रमास की मुख्य विशेषता यह होती है कि इस ऋतु में न तो ज्यादा शीत और न ही ज्यादा गर्मी सरलतम रूप में कहें तो संतुलित सरसतापूर्ण वातावरण बना रहता सम्भवतः इसीलिए विधाता ने सृष्टि की रचना करने के लिए सर्वाधिक उपयुक्त समय माना होगा।
इसके साथ ही हमारे पूर्वजों मनीषियों ने चैत्रमास शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि से नववर्ष के आगमन का स्वागत करते आए हैं।
भारतीय नववर्ष या चैत्र मास की श्रेष्ठता यह बस ही नहीं बल्कि हमारे यहां धार्मिक, अध्यात्मिक ,पौराणिक एवं वैज्ञानिक महत्ता के प्रतिपादन का भी एक लम्बा इतिहास रहा है उसी वटवृक्ष की शाखाएं विविध रूपों में अपने मूलतत्व को समेटे हुए जीवटता का बोध कराती हैं।
इसके साथ ही सबसे महत्वपूर्ण बात यह भी है कि अन्याय, अत्याचार एवं अधर्म रूपी रावण का समूलनाश करने के उपरांत भगवान श्रीराम के अयोध्या आगमन के उपरांत प्रभु का राज्याभिषेक भी चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को ही हुआ था इसी के साथ रामराज्य के शंखनाद की ध्वनि से समूचा जगत एकरूपता में तल्लीन हो गया था।
इसी तिथि को भगवान झूलेलाल जिनका अवतरण सनातन धर्म की शाखा के सिन्धी समाज द्वारा चेटीचंड के रूप में मनाते हुए विश्व में सुख-शांति -सौहार्द एवं जीवमात्र के प्रति प्रेम की ईश्वर से कामना करते हैं।
भगवान झूलेलाल को हमारे धर्मग्रंथों में वरुणदेव अर्थात जल के देवता के रुप में भी पूजन किया जाता है, भगवान झूलेलाल की विभिन्न रूपों में आराधना करते हुए उनसे सभी दिशाओं में खुशहाली एवं हरियाली रहे जिससे जीवजगत चहकता रहे का वरदान मांगा जाता है।
महाभारत काल अर्थात द्वापर में भी चैत्रशुक्ल प्रतिपदा तिथि का अपना एक अलग महत्व रहा है इसी तिथि को सत्य व असत्य के महाभारत युद्ध के बाद दिग्विजयी होने के उपरांत महाराज युध्दिष्ठिर का भगवान श्रीकृष्ण के पाञ्चजन्य शंख के उद्घघोष के साथ ही राजतिलक हुआ था एवं धर्म की स्थापना का संकल्प लिया गया जिससे सम्पूर्ण आर्यावर्त में सुख-शांति एवं धार्मिक चेतना की अविरल धारा निरंतर प्रवाहित होती रही।
इसीलिए चैत्रशुक्ल प्रतिपदा तिथि का विशेष महत्त्व सहस्त्रों वर्ष पूर्व से हम सभी के लिए है, समय की गति के साथ ही चैत्रशुक्ल प्रतिपदा तिथि अपने अर्थ एवं महात्म्य बोध को अपने में समेटे हुए है।
इसीलिए हमारे धार्मिक, पौराणिक इतिहास के साथ अपने अद्वितीय महत्व को यह तिथि समेटे हुए है। इसी दिन महाराज विक्रमादित्य ने विक्रम संवत्सर का प्रतिपादन किया जिसे भगवान महाकाल की पावन नगरी तात्कालीन उज्जैनी वर्तमान उज्जैन की पावन पुनीता शिप्रा नदी के तट पर संवत पर्व मनाया था जिसे हम तभी से लेकर हिन्दूनववर्ष के रूप में मनाते आ रहे हैं।
भारतीय धार्मिक-सामाजिक एवं अध्यात्मिक चेतना के प्रखर पुरुष महर्षि दयानंद ने आर्य समाज की स्थापना चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को ही की थी जिसका उद्देश्य सम्पूर्ण वैदिक ज्ञान को पुनर्स्थापित एवं समाज को जागृत करने का था।
इसी तरह वर्तमान में विश्व के सबसे बड़े स्वयंसेवी सामाजिक संगठन राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के संस्थापक आद्य सरसंघचालक केशवराम बलिराम हेडगेवार जी की जयंती भी चैत्रशुक्ल प्रतिपदा तिथि को ही मनाई जाती है।
इस तरह चैत्रशुक्ल प्रतिपदा तिथि को मनाया जाने वाला हिन्दूनववर्ष हमारे राष्ट्र की सांस्कृतिक-पौराणिक,सामाजिक-ऐतिहासिक, आध्यात्मिक परम्परा के संवाहक के रुप में जीव व प्रकृति के मध्य अन्तर्निहित सम्बन्धों को व्यक्त करने के साथ धर्म व मानवीय चेतना के प्राणतत्व को समाहित किए हुए विश्व की श्रेष्ठतम संस्कृति का ध्वजवाहक है।
इस तरह हम भारतीयों का यह प्रथम कर्तव्य है कि पश्चिमी अंधानुकरण के भ्रमजाल से निकलकर अपनी जड़ों की ओर आएँ एवं महान सभ्यता के नववर्ष को बढ़चढ़कर मनाएं जिससे भारतवर्ष का गौरव पुनः विश्वपटल पर स्थापित हो सके जिसमें सभी प्रकार की उन्नति का सार छिपा हुआ है।
॥॥ ॐ 卐 ॐ 卐 ॐ 卐 ॐ 卐 ॐ ॥॥


No comments